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इब्तेदा : रविश कुमार टाटा सामाजिक विज्ञानं संस्थान में मीडिया और सरकार पर बुल्बुलाते हुए

By द सभा Feb12,2016

खुली हुई खिड़कियाँ  है बस दिमाग बंद है
आँखें भभक रही है और जुबां लहेक रही है
एक टीवी है और शोर भरी शांति है

वो जो सब के बीच बैठा है, तूफ़ान पैदा करता है सवालों से
नावों को हिला दुला देता है
३दी होती हमारी कल्पनाओं में रोमांच पैदा करता है
जनमत को डूबने के लिए अकेला छोड़ वो नावके डोर से खेलता है
कुछ को डूबा देता है कुछ को बचा लेता है
ताकि डरा सके हमारी कल्पनाओं को डूबने के दहशत के बीच
डरे हुए लोगों में खीच पैदा हो और खुजलाहट भी
पैदा हो हैश टैग और ट्वीट भी
एंकर माई-बाप है एंकर सरकार है

सरकारों का एंकर है या नावो का इस सवाल का मतलब नहीं
क्यूंकि सरकारों को सवाल पसंद नहीं है
टीवी के खिडकियों पर कबूतर चेहेक रहे हैं
सुना है मुर्दे लोग भी जागरूक हो रहे हैं
टीवी के खिडकियों पर कबूतर चेहेक रहे हैं
सुना है मुर्दे लोग भी जागरूक हो रहे हैं
प्राइम टाइमी रात के अंधेरों में काल कपाल महकन्कल चिल्लाने वालों ने अपना भभूत बदल लिया है,
बहुत जर्नलिज्म कर रहे हैं आज कल सब

प्राइम टाइमी रात के अंधेरों में काल कपाल महकन्कल चिल्लाने वालों ने अपना भभूत बदल लिया है,
जवाबदेही की वर्चुअल रियलिटी का दौर है ये
कोई मोबाइल अप्प बनाया जाये किसी रोते हुए बच्चे को हँसाने के लिए
किसी एंकर को बुलाया जाये सरे जवाबों के लिए
व्व्फ़ का मैच चल रहा है
अक्स वाई ज्हेद बुलाये जरे हैं
ऐ बी सी डी ई अफ गी एह उगाल्वाये जा रहे हैं
अल्फपेट की बेल्ट कमर में कस के बाँध लीजिये
जनमत की फ्लाइट कोहरा छटते ही उड़ने वाली है

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