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इंद्रमल बाई की खुदखुशी – एक संस्थानिक हत्या

पारधी, इद्न्रामल बाई की संस्थानिक हत्या
पारधी, इद्न्रामल बाई की संस्थानिक हत्या

शहरी मजदूर संगठन, भोपाल .

इन्द्रमल बाई 32वर्ष की थी. जब 20 नवम्बर 20 17 को उन्होंने भोपाल के हमीदिया में आखरी सांस ली . बैरागड़ में अपनी बसाहट से खदेड़े जाने के बाद, वो गए 10 साल से गाँधी नगर में अपने दो बच्चों के (13 वर्षीया बेटी और 10 वर्षीय बेटे ) और बूढी माँ के साथ रहती थी.

स्थानीय गाँधी नगर थाने में पदस्थ संदीप, गजराज और यादव के हाथों 8 दिन से लगातार चल रही पुलिस प्रतारणा से त्रस्त, उत्तेजित और पूरी तरह से हारकर, इन्द्रमल को आत्मदाह के आखिरी कदम को उठाने के लिए मजबूर होना पड़ा. ये तीन पुलिसकर्मी गजराज यादव ओए संदीप उन से पैसे ऐठने के चक्कर में थे पैसे नही देगी, तो केस बना देगे. उनकी 20 ,000 रुपये की मांग थी . इन्द्रमल ने बार बार मिन्नतें की, कि उसने कुछ नही चुराया है. न ही पैसे है कि पुलिस की पैसे की मांग पूरी कर सके . पुलिस पर इन्द्रमल की मिन्नतों का कोई असर नही पड़ाउन्होंने उसे नही बख्शा. उस दिन ( शुक्रवार, 17 .11 .17 ) , भ्रष्ट पुलिसकर्मी इन्द्रमल के घर तीन बार आये. अंततः वे इतनी त्रस्त और परेशांन हो गई की ऊन्होने अपने उपर घासलेट डाल दिया. फिर भी खड़े पुलिसकर्मी यही बोलते रहे की पारधियों के नाटक ख़तम ही नही होते और उन्हें खीचकर थाने ले जाने लगे . इसी बीच उन्हें आग लग गई (शायद पुलिस वाले की माचिस से क्योंकि इस सब में उनकी बेटी उनके हाथ से माचिस छीन चुकी थी ) . इन्द्रमल के परिवार वाले भागते हुए उन्हें बचाने पहुचे लेकिन 60% से ऊपर जल गई .खड़े पुलिसकर्मी वारदात की संजीदगी को पहचान ही नही रहे थे. उन्हें इन्द्रमल की जान की कोई परवाह नही थी और वे अपनी हरकतों से बाज़ नही आ रहे थे. दो दिन बाद, 20.11.17 की रात 12:40 बजे इद्रमल हम सबको छोड़ कर चली गई .इन्द्रमल को न्याय मिल सकेयह एक कठीन और मुश्किल रास्ता है. प्राथमिकी दर्ज़ करने का सबसे पहला कदम भी अभी तक नदारद है.

संभवतः इसलिए क्योंकि वे मुख्यधारा समाज की महिला नही थी.

हाँ, वे एक पारधी महिला थी हाँ उनकी बेटी कबाड़ा बीनने जाती है. हाँ उनके बच्चे पढाई छोड़कर घर की कमाई सुनिचित कर रहे थे. हाँ उनका बेटा फुग्गे बेचकर कभी कभार घर में पैसे लता था. हाँ, वे छोटे गाँव, शहर में जाकर चूड़िया, अंगूठी, रुद्राक्ष बेचती थी और एक बड़े दफ्तर में काम नही करती थी.

हाँ, वे इस देश की एक मजदूर औरत थीहाँ, वे पक्केपन से इस देश की मुख्यधारा समाज की एक इंसान नही थी. जिनको राज्य आसानी से बदनाम नही कर सकेपर क्या इस सब से वे भारत की एक नागरिक बन जाती है?

जब अगले दिन 18.11 .17 को, इन्द्रमल के परिजनों ने पुलिस थाने में शिकायत दी, तब थाना अधिकारी ने FIR दर्ज़ करने से इंकार कर दिया.

क्या हम उसी पुलिस थाने से शिकायत दर्ज़ करना अपेक्षित कर सकते है, जंहा के पुलिसकर्मी खुद लोगों को प्रताड़ित कर रहे थे?

इन्द्रमल बाई की संस्थानिक हत्या पर,गाँधी नगर थाने में विरोध करते पारधी समाज
इन्द्रमल बाई की संस्थानिक हत्या पर,गाँधी नगर थाने में विरोध करते पारधी समाज.

क्या वरिष्ट पुलिस अधिकारी परधियो के साथ इस तरह की रोज़ गैरकानूनी और बिलकुल मनोबल तोड़ देने वाली हरकतों से वखिफ़ नही है? क्या वे इसको नज़रंदाज करते हुए, एक तरिके से इसे बढावा नही दे रहे? क्या पुलिस थानों में पारधी समाज के लोगों आदमी, औरते और बच्चों का लगातार मानव आधिकारों का हनन नही होता ?

इन हरकतों पर तुरंत सख्ती दिखने के की जगह, पुलिस ने जांच बैठाकर आसान और सुरक्षित रास्ता अपना लिया .

तीन दिन पहले ही ( नवम्बर क 14 को ) इन्द्रमल और उनके परिवार और बस्ती के कई लोगों ने इसी पुलिस थाने के कर्मियों द्वारा प्रताड़ना, मारपिटाई और पैसे की मांग को लेकर कलेक्टर की जन सुनवाई में शिकायत दी थी .

इससे दस दिन पहले कि बात है की बाज़ार से एक और आदमी को उठाकर, इसी थाने में मारापिटा गया था और पैसे की मांग की गई थी . जब यह मांग पूरी नही हो पाई, तो छुरी की नकली जब्ती दिखाकर जेल भेज दिया गया .

इसी साल भोपाल की विभिन्न बस्तियों के पारधी समाज के लोगों ने लगातार विभिन्न थानों के पुलिसकर्मियों द्वारा बच्चों और बड़ो के साथ हो रही पुलिस प्रताड़ना और रिश्वत की मांग को लेकर वरिष्ट अधिकारियों के सामने शिकायत दर्ज़ करी, लेकिन कोई विशेष और स्थाई हल नही हुआ.

पारधी एक विमुक्त आदिवासी समुदाय, दशकों से पुलिस प्रताड़ना का शिकार रहा है.

19 जनवरी 2018 को टिंटी बाई की कमला नगर थाने (भोपाल) के पुलिस कर्मचारियों की प्रताड़ना के चलते खुदखुशी के 10 साल हो जाएंगे इस मामले में म.प्र. मानव अधिकार आयोग ने अपनी जांच में ASI ऍम .एल यादव को स्पष्ट; दोषी ठहराया था लेकिन मानव अधिकार आयोग की सिफ़ारिशो के बावजूद, पुलिस जांच शुरू ज़रूर हुई पर आज तक जांच का अंत नही हुआ.

28 .अगस्त 2001 की बनाबाई बंशी पावर द्वारा महाराष्ट्र के उस्मानाबाद जिले के अदालत में अपने आप को आग लगाकर जान देने की घटना उनकी और सैकड़ो परधियो की प्रताड़ना से परेशांन होने की जिंदगीभर की व्यथा दर्शाता है.

कईयो ने इस दबाव के चलते अपनी जान खोई है, और बाकी रोज़ की असुरक्षा और बेज्जती की जिन्दगी, और शक के घेरे में जीने के लिए मजबूर हैनई टीशर्ट पहने हुए बाज़ार में पारधी लडकों को इसलिए उठाया जाता है,की चोरी कर के पहनी होगी. काम से लौटते हुए लड़को को पुलिस से ताना मिलता है की कब तक तुम्हे कोई नौकरी देगा . स्कूल में पढ़ रहे बच्चों को सुनने को मिलता है की पारधी कब से पढ़ने लग गये, पढ़लिख कर बैंक चुराओगे .

कबाड़ा बीनने का काम करने वाले परिवारों के बच्चों के साथ स्कूलों में उनकी जाति और काम से जुडा भेदभाव किया जाता है. इन सभी मायूस और हतोत्साहित करने वाले अनुभवों के बावजूद जब कुछ बच्चे आगे पड़कर निकलते है तो कोई और रास्ते भी नही खुलेते दिखते.

2002 में भोपाल, रायसेन और सीहोर ज़िले से पारधी समाज को अनुसूचित जनजाति की सूची से हटाना इस ऐतिहासिक हाशियाकृत समाज के लिए एक और धक्का ही साबित हुआ है.

 गाँधी नगर थाने में प्राथमिकी दर्ज करने के लिए पीड़ितो द्वारा प्रयास .
फोटो क्रेडिट: मधुधुर्वे | गाँधी नगर थाने में प्राथमिकी दर्ज करने के लिए पीड़ितो द्वारा प्रयास .

20 नवम्बर, इन्द्रमल की मौत के बाद जब लोग इक्कठे होकर प्राथमिकी दर्ज़ करने की मांग के साथ फिर से गांघी नगर थाने गये, तो दो घंटे शांतिपूर्वक बैठने के बाद भी इस मांग पर कोई पक्का जवाब नही मिला और यही बोला गया की इन्द्रमल ने मृत्युपूर्व बयान में एसी बात नही बोली और अभी जांच जारी है.

शिकायत दिए हुए तीन दिन बीत चुके थे. चश्मदीद गवाहों की बात ना स्वीकार कर, वरिष्ट पुलिस अधिकारी थाने के परिसर के अन्दर ही कार्यकर्ताओ के साथ धक्कमधक्का करके उन्हें गिरफ्तार करने की कोशिश करने लगे. इसके चलते प्रदर्शन में हलचल हो गई और थाने के अन्दर और बाहर, दोनों तरफ से पत्थरबाजी हुई. बाहर लोग तुरंत शांत भी हो गये, लेकिन अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक ने उत्तेजित होकर पहले से ही पीड़ित और दुखग्रस्त परिवार और समुदाय पर अन्धाधुन्ध लाठीचार्ज करना शुरू कर आंसूगैस के गोले फैके.

आज हम, सब इन्द्रमल के परिवार, पारधी समाज और देश के मेहनतकाश लोगों साथ खड़े होकर, न्याय और जीवन के बराबरी के मौकों की मांग करते है. देश के हाशियाकृत समुदायों की सुरक्षा की संस्थानिक असफलता के कारण इन्द्रमल की मौत हुई है. यह एक संस्थानिक हत्या है,

इसके पीछे पुलिसकर्मियों की अपराधों की लगातार और लम्बी कड़ी जुड़ी हुई है. यह एक आकस्मिक मौत नही है, सैकड़ो लोग आज भी इसी कगार पर जी रहे है. इन्द्रमल के मसले में, सिर्फ वो तीन पुलिसकर्मी यादव संदीप ,गजराज जिन्होंने इन्द्रमल को ताने मारे और पैसो की मांग करी, यही अपराधी नही है, वो सभी इस अपराध में शामिल है जिन्होंने समय पर हस्तक्षेप न करके अपराध को नही रोका और आज तक न्याय नही दिया.

पक्षियों और छोटे जानवरों के शिकार के अपने पुश्तैनी कामों से वंचित होकर, पारधी समाज अलग अलग छोटेमोटे कामों का सहारा लेना पड़ा है, ऐसे कम जिनको समाज नीची नज़र और शक से देखता है, जैसे कबाड़ा बिनना.

इसके अलावा वे उपनिवेश काल से लगे हुए अपराधिक जाति कानून के धब्बे का बोझ भी ढोते जा रहे है.

मीडिया में पुलिस की तरफ से यही आ रहा है की इन्द्रमल ने अपनी मृतु पूर्व बयान में बोला था की उसको जलते हुए कबाड़ा से गलती से आग लग गई थी. इस तरह  का बयान पुलिस को बचाने के लिए ही जानबूझकर लिखा गया है. जब इन्द्रमल अस्पताल में भर्ती हुई, तो उपरोक्त थाने की पुलिस और एक आरोपी पुलिसकर्मी, यादव भी उनके वार्ड में घूम रहा था और बारबार उनके पलंग के पास जा रहा था किस तरह से उनसे सवाल पूछे गये और किस किस तरह से जवाब लिखे गये इस पर शंका है.

वारदात के चश्मदीद गवाहों और इन्द्रमल के खुद के (इस कथित मृतु पूर्व बयान देने के पहले और बाद के वीडियो बयान स्पष्ट दिखाते है की पुलिस के दबाव के चलते उनको यह कदम उठाना पड़ा) वसूली और आत्महत्या के लिए प्रेरित करने के जुर्म में दोषी पुलिसकर्मीयो पर केस दर्ज करने के बदले ,पुलिस ने अपनी जाँच पहले करना ज्यादा मुनासिफ समझा. एक संगीन अपराध में FIR दर्ज़ करना पुलिस की सर्वप्रथम जिम्मेदारी है.

सर्वोच्च न्यायलय ने ललिता कुमारी विरुद्ध उत्तर प्रदेश शासन में इस बात पर ज़ोर दिया है.

इन्द्रमल के जीते हुए, जांच अधिकारी ने उनसे मिलकर बयान लेने की कोई ज़रूरत नही समझी . पर जांच पूरी होने के पहले ही (मीडिया रिपोर्ट अनुसार) वे इन्द्रमल के व्यक्तित्व पर बुरी टिप्पणी कर रहे है. आज परिवारजनों से बयान लेने के बाद भी, मसला अभी भी विचाराधीन है.

इन्द्रमल बाई को न्याय मिले, यही हम मेहनतकश लोगों की मांग है.
फोटो क्रेडिट: मधुधुर्वे | गौतम नगर बस्ती की महिलाये मांग कर रही है. इन्द्रमल बाई को न्याय मिले, यही हम मेहनतकश लोगों की मांग है.

क्या शासन की और उनके परिवार को न्याय देने की कोई तीव्र इच्छा नही है? क्या इन्द्रमल बच सकती थी अगर राज्य शासन उनकी स्थिति को थोड़ी संजीदगी से देख लेता और उनको कोई मिलने आ जाता? परिवार कब न्याय का इंतजार करे? क्या अंग्रेजों के समय से पहुचाई जा रही चोट की कोई भरपाई होगी? हम देश के सभी नागरिकों को बराबरी का दर्ज़ा देने की इच्छा रखते है?हम राज्य सरकार से पारधी समाज के लिए न्याय और जीवन में मौकों की मांग करते है.

  • तीनों पुलिसकर्मियों के विरुद्ध FIR दर्ज़ हो और इस मसले में सख्त और तुरंत कार्यवाही हो, जिसकी शुरुआत तीनों पुलिसकर्मियों की गिरफ्तारी से शुरू हो.
  • न्याय में बाधा डालने और विलम्ब करने वाले पुलिस अधिकारी के खिलाफ कार्यवाही हो.
  • इन्द्रमल बाई के बच्चों और बूढी माँ को उचित मुआवज़ा दिया जाये.
  • अस्पताल में इन्द्रमल बाई के साथ हुई बदसलूकी और उनकी अप्रत्याशित मौत की जांच हो.
  • प्रदर्शन में शामिल लोगों में उमके ऊपर कार्यवाही का भय पैदा न किया जाए. पिछले कुछ वर्षो के दौरान पारधी समाज द्वारा जिन पुलिसकर्मीयों के खिलाफ शिकायतें दर्ज़ की गई है, उन शिकायतों की संजीदगी से जांच की जाये.
  • पारधी समाज की अपनी जिन्दगी को बेहतर जी पाने के प्रयास में सहयोग कर कृषि ज़मीन और जीविका के लिए लोन दिए जाएँ.
  • आदिवासी अनुसंधान संस्थान की अनुशंसा अनुसार, पारधी समाज को पुरे राज्य में अनुसूचित जनजाति की श्रेणी में जोड़ा जाये.विमुक्त, घुम्मकड़ और अर्दधघुम्मकड़ जाति आयोग की अनुशंसाओं का क्रियान्वयन हो.
इन्द्रमल बाई को न्याय दो न्याय दो .दोशी पुलिस कर्मियों को सज़ा दो सज़ा दो.
फोटो क्रेडिट: मधुधुर्वे | सरगम बस्ती की दो महिलाये मांग कर रही है. इन्द्रमल बाई को न्याय मिले, यही हम मेहनतकश लोगों की मांग है.

हमें हमेशा किसी के पक्ष में होना चाहिए. निष्पक्षता अथवा बेसरोकारी से हमेशा अत्याचारी को मदद मिलती है, उत्पीड़ित को नही. कभीकभी, हमें हस्तक्षेप करना ही चाहिए. जब मानव जीवन खतरे में होता है, जब मानव सम्मान डांवाडोल होता है, राष्ट्रीय सीमायें और संवेदनशीलताओं का कोई मतलब नही रह जाता.

जब भी आदमी औरत अपनी जाति, धर्म या राजनैतिक नज़रियों के कारण प्रताड़ित किये जाते है. वो जगह उस पल विश्व का केंद्र बन जाती है. “- एली विजिलनोबेल शांति पुरस्कार विजेता.

(शहरी मजदूर संगठन, भोपाल की बस्तियों में होने वाली परेशानियों को बस्ती के लोगों द्वारा सुधार करना  तथा परेशानियो को एक दुसरे से साझा करने का खुला मंच है.)

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