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ओबामा टीम में दो भारतीय: काल पेन्न और फ्रैंक इस्लाम

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काल पेन्न ओबामा टीम के साथ भारत दौरे पर आये थे. हर मौके का बहुत ही सुन्दर फोटो निकाला, गार्डन से ले के राष्ट पति भवन तक.

उनके ट्वीट के हिसाब से ये पता लगा कि उनके पिता १९६७ में मात्र ५०० रुपए और बहुत सारी उम्मीदों के साथ अमेरिका आये थे.
इन खूबसूरत और अनेक पलों में जहाँ वो एक अभिनेता हैं और राजनीति के भागी हैं, उनकी फिल्म भोपाल -बारिश की विनती को भी जरा याद करें. यह फिल्म भोपाल वायु त्रासदी पर बनी थी जिसमें अभी भी बहुत से पीड़ितों को मुवाजा नहीं मिला है. कंपनी के मालिक अमेरिका से थे जो कि कई दस्तावेजों और भारत सरकार की अपनी ही नागरिको के प्रति असंवेदना के सहारे अभी भी आजादी से ऐश कर रहें हैं. उनकी कंपनी भारत में नाम बदल कर कीटनाशक तो क्या क्या बेचे जा रही है.

पर इस बार भारत और अमेरिका में जो परमाणु डील हुई है , उनकी तारीफ में पेन्न ने बहुत मोबाइल में टप टपआया. इस डील के इरादे दो यहीं इशारा करते हैं कि अमेरिका की कंपनियां कोई भी दुर्घटना के लिए जिम्मेदार नहीं रहेगी. शायद पेन्न की अगली फिल्म का नाम परमाणु की विनती होगी, क्यूंकि भारत तो विदेशी कचड़ा ले के मानेगा. वो कचड़ा जिसको मिटाया नहीं जा सकता, और वो तकनीक जो कि विकसीत देश भी बंद किये जा रहे हैं. पर भारत में इसके खिलाफ बोलने से आई. बी पीछे पड़ती है. और आप देशद्रोही भी करार दिए जा सकते हैं. भाई साहब रूस और अमेरिका का कचड़ा है. कोई मजाक नहीं ! आख़िर करोड़ों का डील है , बस ये समझ नहीं आ रहा है कि भारत विकसित देश से पैसे ले रहा है या यहाँ के पर्यावरण को देश की उर्जा के नाम पे करोड़ों की दलाली कर रहा है.

ख़ैर जब विपक्षी राजनैतिक पार्टी को ही नहीं पता कि हुआ किया है, तो ज्यादा टिप्पड़ी करना उच्चित नहीं होगा.

आजमगढ़ में जन्मे मशहूर भारतीय-अमेरिकी उद्यमी फ्रैंक इस्लाम को प्रतिष्ठित मार्टिन लूथर किंग जूनियर पुरस्कार से नवाजा गया है.

इस्लाम को रविवार को मेमोरियल फाउंडेशन के अध्यक्ष हैरी जॉनसन ने यह पुरस्कार प्रदान किया. इस मौके पर इस्लाम ने कहा, मार्टिन लूथर किंग और महात्मा गांधी के बीच अमिट रिश्ता था. किंग 1954 में भारत दौरे पर गए थे और उन्होंने गांधी से अहिंसा आंदोलन की सीख ली थी.
इस्लाम ने किंग और गांधी को अपना मार्गदर्शक करार दिया. इस पुरस्कार की शुरुआत 1991 में मार्टिन लूथर किंग जूनियर और महान नेता डोरोथी आइ हाइट की याद में की गई थी, जिनका प्रभाव देश और विदेश दोनों जगह रहा है.

उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले में एक किसान परिवार में जन्मे इस्लाम महज 15 साल की उम्र में अमेरिका चले आए थे. उस समय पांच सौ डॉलर (करीब 31 हजार रुपये) से भी कम अपने साथ ले जाने वाले इस्लाम बाद में एक सफल उद्यमी बने. उन्होंने अपना घर गिरवीं पर रखकर 1993 में मेरीलैंड की एक घाटे में चल रही आइटी कंपनी को 50 हजार डॉलर (करीब 31 लाख रुपये) खरीदा था. उन्होंने 2007 में अपनी आइटी कंपनी बेच दी और अपना जीवन परोपकार के कामों में लगा दिया.

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