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शिक्षा के स्तर में सुधार की अच्छी पहल ….

Dailyhunt से साभार … 

 

सच्चे इवेंट पर आधारित होने का दावा करने वाली इरफान खान स्टारर फिल्म हिन्दी मीडियम का ट्रेलर हाल ही में रिलीज हुआ है। हाई फाई स्कूल में पढ़ेगा इंडिया, तभी तो आगे बढ़ेगा इंडिया की पंच लाइन देते हुए निर्देशक ने फिल्म को आज के परिदृश्य से जोड़ने की कोशिश की है। वैसे हाई फ़ाई स्कूलों में एक खास वर्ग के ही बच्चे पढ़ते है इससे किसी को कोई आपत्ति नहीं हो सकती है। शिक्षा से ही इन ख़ास वर्ग का एक क्लास बना है । जो एक विदेशी भाषा को अपनाते हुए आगे अपने चरम पर है । और दूसरों को ओछी नज़र से देखता है।
शिक्षा हमारी मूलभूत जरूरत है । इसे पाने का अधिकार हर नागरिक का है। खासकर महिलाओं की शिक्षा को लेकर प्रयास दोगुने होते आज की विज्ञापनों में देखे जा सकते है। यह बात और है नतीजे की सच्चाई कुछ और ही हो ।
बीते दिनों सीकर के एक सरकारी स्कूल से सार्थक ख़बर सामने आई जिसमें पता चला कि गाँव के लोगों ने मिलकर स्कूल के 20 गुणे 25 के 18 कमरे बनवाए और बच्चो को लाने ले जाने के लिए खुद के इन्तेजाम से 4 गाडियाँ भी खरीदी । एक खबर तो इसी गाँव से यह भी मिली कि यहाँ हर वर्ष लगभग 6 लाख से ऊपर की राशि इसी तरह गाँव वाले इकट्ठा करते है।
विभिन्न अनुभवों को अगर गौर किया जाये तो हमे यह जरूर पता चलेगा की सरकारी स्कूल में पढ़ने वाले छात्रों को प्राइवेट के मुक़ाबले कमतर समझा जाता है। इसी का नतीजा है की दिन पर दिन सरकारी स्कूलों में छात्रों की संख्या लगातार कम हो रही हैं । शायद इसी को ध्यान मे रखकर उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने प्रदेश के अधिकारियों के बच्चों को सरकारी स्कूलों में पढ़ाने के लिए बाध्य करने जैसा कडा नियम बनाने का खाका तैयार कर लिया है।
सरकारी स्कूलों के हालात सुधारने के लिए यह बड़ा और सराहनीय कदम है जिसकी हर कोई तारीफ़ कर रहा है। उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा इसके इलावा स्कूल में छात्रों की उपस्थिति को शत प्रतिशत अनिवार्य किए जाने के साथ, पेयजल और विद्यालयों में शौचालय की व्यवस्था भी सुनिश्चित करवाई जाने हेतु अपना ध्यान दिया है। शिक्षा के स्तर मे बदलाव हेतु राष्ट्रीय आविष्कार अभियान के तहत 1760 उच्च प्राथमिक विद्यालयों में विज्ञान और गणित लैब विकसित करने का फैसला भी सराहनीय है। यहाँ गौर करना यह भी जरूरी है कि पिछले साल मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने एक विवादित वयान मे कहा था कि राजनेताओं और अधिकारियों के बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ेंगे तो सरकारी बोझ बढ़ेगा ।
ऐसा नहीं है की सरकार द्वारा ही शिक्षा के स्तर को सुधारने की बात की जा रही है। इससे पहले भी कई अन्य प्रयास किए गए है। उत्तरप्रदेश के रामपुर जिले के एक सरकारी प्राइमरी स्कूल के प्रधानाचार्य ने ऐसा ही कर दिखाया है। उन्होंने स्कूल की काया पलट दी और सरकारी स्कूल को बिल्कुल प्राइवेट जैसा बना दिया। दरअसल, रामपुर के घाटमपुर में एक सरकारी प्राइमरी और जूनियर स्कूल है जिसमें मुजाहिद खां प्रधानाचार्य हैं। उनके आने के बाद इस स्कूल में आठ शौचालय हैं चार लड़कियों के लिए और चार लड़कों के लिए जबकि जिले के अन्य प्राइमरी स्कूलों में एक शौचालय हैं। स्कूल में हर कक्षा में कारपेट बिछी है जिससे बच्चों को बैठने में परेशानी न हो और बच्चों को मिडडे मिल में खाना भी अच्छा मिलता है और इस स्कूल में मुजाहिद खां ने बच्चों के लिए लाएब्रेरी भी बनाई है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बीते वर्ष सरकारी अफसरों के बच्चों को सरकारी स्कूलों में पढ़ने या फिर निजी स्कूलों की फीस के बराबर पैसा वेतन से काट लेने की बात कही गयी थी। साथ ही ऐसे लोगों का कुछ समय के लिए इन्क्रीमेंट व प्रमोशन भी रोक लिया जाए। कोर्ट ने साफ किया कि जब तक इन लोगों के बच्चे सरकारी स्कूलों में नहीं पढ़ेंगे, वहां के हालात नहीं सुधरेंगे।
लेकिन अभी तक बात सिर्फ काजगी हुई है। आदेश ही हुए है। इनका जमीनी क्रियान्वयन कब से होगा इसका इंतजार हमें भी है।
सरकार द्वारा मिड डे मील,से लेकर फ्री शिक्षा तक के कई कार्यक्रम चलाये जाते है । सरकार का सारा फोकस उन गरीब लोगो पर होता है जो शिक्षा से वंचित वर्ग से आते है। लगभग सभी पंचवर्षीय योजनाओं में शिक्षा को नज़रअंदाज़ किया जाता रहा है नहीं तो आज हालत कुछ और होते। हालांकि प्राइवेट स्कूलों के मॉडल को सरकार द्वारा प्रयोग किए जाने पर हालत सुधरने की गुंजाइश बढ़ सकती है। आखिर उन्ही सरकारी अधिकारियों के बच्चे उन्ही प्राइवेट स्कूलों में शिक्षा प्राप्त करते है।
सामाजिक स्थिति को देखने का प्रयास करें तो हम जौर देख पाएंगे कि हमें नौकरी तो सरकारी चाहिए लेकिन उसी स्कूल के हेड मास्टर या अध्यापक का लड़का प्राइवेट या विदेश में पढ़ाई करता भी आपको मिल जाएया। उच्च शिक्षा तक आते आते तो यह और भी विकराल रूप ले लेता है।
बात सरकारी स्कूलों स्कूलों में पढे छात्रों के भविष्य को लेकर करें तो एक और बड़ी विकराल समस्या हमारे सामने खड़ी होगी भाषा को लेकर । जाहीर है हिन्दी भाषी राज्यों के सरकारी स्कूलों में मीडियम हिन्दी होता है। वहीं प्राइवेट स्कूलों में अङ्ग्रेज़ी को लेकर बढ़ावा दिया जाता है। उच्च वर्ग के बच्चे अङ्ग्रेज़ी मीडियम के सहारे और आगे बढ़ते चलते जाते है, वहीं सरकारी स्कूलों का हिन्दी मीडियम छात्र भाषाई स्तर पर पिछड़ता चला जाता हैं । जिस ओर भी सरकार को ध्यान देने कि जरूरत है। यह एक अच्छी ख़बर है कि अब अधिकारियों के बच्चे भी उन्ही सरकारी स्कूलों में पढ़ेंगे तो स्कूलों के शिक्षण स्तर पर अधिकारी के साथ साथ स्कूल प्रसाशन भी ध्यान देगा । जिसका फायदा निश्चित तौर पर गरीब बच्चों को मिल रही खाना पूर्ति वाली शिक्षा से ऊपर मिलने वाली शिक्षा के रूप में मिल पाएगा।

प्राइवेट स्कूलों की मनमानी पर लगाम कसने के लिए केंद्र सरकार को कड़े नियम बनाने चाहिए । फीस के नाम पर मनमानी,किताबों और अन्य जरूरत के लिए अभिवावकों को परेशान करना लगातार बढ़ता जा रहा है। पाठ्यपुस्तकों को दिन पर दिन बढ़ाए जाने तथा निर्धारित मानक न बनाया जाना भी एक बड़ी समस्या है। वहीं दूसरी तरह प्राइवेट स्कूल तरह तरह के इवेंट(पैरेंट्स मीटिंग,हॉलिडे टूर,समर टूर,फ्रेशर,फेयरवेल आदि) के नाम पर अभिवावक और माता पिता का जो आर्थिक शोषण करते है उस ओर भी ध्यान देने की जरूरत है। शैक्षणिक स्तर पर सुधार के लिए एक प्रयास बच्चों के स्लेबस को लेकर भी किया जाना चाहिए । छोटी कक्षाओं के बच्चों को उनके स्तर से काफी ऊपर का पाठ्यक्रम उन्हे लगातार मानसिक रूप से परेशान करता है। छोटी उम्र में बड़े बस्ते लाद देना भी बाल शोषण से कम नहीं हैं । वही सरकारी स्कूलों में स्लेबस को लेकर गहन चिंतन किया जाना अभी बाकी हैं । हमारी सांझी विरासत,इतिहास,और भौगोलिक दर्शन शुरुआती शिक्षा में अगर नहीं मिल पाया तो हमारा सामाजिक विकास शायद ही हो पाये? बीते दिनों राजस्थान के सरकारी स्कूलो के पाठ्यक्रम से नेहरू जी को स्लेबस से बाहर करना एक बड़ी घटना थी ।

देश में अङ्ग्रेज़ी भाषा नहीं, क्लास है इस संवाद को जब साकेत चौधरी की फिल्म हिन्दी मीडियम के ट्रेलर में हम देखते है तो फिल्म में जुड़ाव होने लगता है। शादी शुदा जोड़ा जब अपने बच्चे की शिक्षा के लिए इस कदर परेशान है कि हमारी बच्ची इंग्लिश स्कूल में पढ़ लेगी तो हाई-फ़ाई हो जाएगी नहीं तो कालोनी में स्टेटस गिर जाएगा। यह आज के नए भारत की तस्वीर है जो शिक्षा को लेकर गहरी खाई समाज में बनती जा रही है उसका नतीजा है। बहरहाल साकेत चौधरी की पूरी फिल्म 12 मई को रिलीज होगी वहीं उत्तर प्रदेश सरकार का भी फैसला तब तक अमली जामा पहन चुका होगा । तो इंतजार कीजिये दोनों का क्योकि ही आपके बच्चों से जुड़े सवालातों के जवाब देने कि ओर अग्रसर है। ऐसा भी हो सकता है कि दोनों ही आपको निराश भी करें। पर बी पॉज़िटिव …

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