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विकास की जुमलेबाजी के बीच राम मंदिर का राग

जयन्त जिज्ञासु

आज मुल्क जिस स्थिति से गुज़र रहा है, वहाँ क्षणिक सियासी फायदे के लिए इंसानियत को दाँव पर लगाने वाले सियासतदाँ सबसे बड़े देशद्रोही हैं।लोकतंत्र में चुनावी तंत्र की कमज़ोरियों का लाभ उठाकर सत्तासीन होने वाले लोग जब ये भूल जाते हैं कि जम्हूरियत जुमलेबाजी से नहीं चला करती, न ही यह किसी की जागीर होती है, तो सामाजिक समरसता व सांप्रदायिक सौहार्द के लिए बड़ा संकट पैदा हो जाता है। चाहे बहुमत की सरकार हो या अल्पमत की, लोकराज लोकलाज से ही चलना चाहिए। एक तरफ विकास के बड़े-बड़े दावे किये जा रहे हैं, दुनिया भर में घूम-घूम कर डंका पीटा जा रहा है, तो दूसरी ओर लोगों को गृहदाह की ओर धकेला जा रहा है। ख़ुद प्रधानमंत्री धर्मनिरपेक्षता शब्द की घर-बाहर गाहे-बगाहे खिल्ली उड़ाते फिरते हैं। तो, गृहमंत्री धर्मनिरपेक्षता की बजाय पंथनिरपेक्षता शब्द को सटीक बताते हुए उसके प्रयोग पर बल देते हैं। मतलब, संविधान की मूल भावना से किसी को कोई लेना-देना नहीं है।सदाशयी, सद्विवेकी दृष्टिकोण के अभाव में देश कभी खड़ा नहीं हो सकता, दो क़दम नहीं चल सकता, सवा सौ करोड़ क़दम चलने की बात तो छोड़ ही दीजिए। इसलिए, बकौल डॉ. बरेलवी, घर सजाने का तसव्वुर तो बहुत बाद का है. पहले ये तय हो कि इस घर को बचायें कैसे.

जैसे-जैसे उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव निकट आ रहे हैं, भाजपा को अयोध्या में भव्य राम मंदिर की आवश्यकता कुछ ज़्यादा ही महसूस होने लगी है। अर्थव्यवस्था की माली हालत सुधारने की सरकार की प्राथमिकता काफूर होने लगी है। यह सिर्फ और सिर्फ बहुसंख्यक आबादी के मन में मुसलमानों के प्रति नफरत फैलाकर हिन्दुत्व के नाम पर गोलबंद करने की ओछी हरकत है। ये वही लोग हैं जिनके लिए मुँह में राम, बगल में छूरी कहावत सटीक बैठती है। समाज के वंचित तबके की घनीभूत पीड़ा व इंसान के रूप में पहचाने जाने के उसके सतत संघर्ष की ईमानदार व उर्वर अभिव्यक्ति के ज़रिये अभिजात्य शासक वर्ग की अमानुषिक प्रणाली के चलते इस देश की सदियों की कचोटने वाली हक़ीक़त व नियति से जब साक्षात्कार कराया जाता है, तो सत्ता तंत्र को सांप सूंघने लगता है। साथ ही, इस मुल्क के निर्माण में इन शोषितों के अनूठे योगदान की जब कोई मुखर होकर चर्चा करता है, तो उसे जातिवादी व समाज को तोड़ने वाला तत्व बता दिया जाता है।अदम गोंडवी ने हिन्दुस्तान की जाति-व्यवस्था व हिंदू धर्म की विसंगतियों व विद्रूपताओं पर तंज कसते हुए कहा था –

वेद में जिनका हवाला हाशिये पर भी नहीं
वे अभागे आस्‍था विश्‍वास लेकर क्‍या करें
लोकरंजन हो जहां शम्‍बूक-वध की आड़ में
उस व्‍यवस्‍था का घृणित इतिहास लेकर क्‍या करें
कितना प्रतिगामी रहा भोगे हुए क्षण का यथार्थ
त्रासदी, कुंठा, घुटन, संत्रास लेकर क्‍या करें

अभी हाल ही में हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय में केंद्रीय राज्य मंत्री दत्तात्रेय व मानव संसाधन विकास मंत्रालय के कथित हस्तक्षेप के बाद पाँच अंबेडकराइट को छात्रावास से निष्कासित कर दिया गया। और, मंत्रालय का कहना है कि इसमें उसकी ओर से कोई दखलंदाज़ी नहीं हुई है। उन निष्कासित पाँच छात्रों में से एक रोहित वेमुला की दु:खदायी ख़ुदकुशी, जिसके लिए विश्वविद्यालयी व्यवस्था द्वारा एक तरह से उसे बाध्य किया गया; हमारे दोहरे मापदण्ड वाले क्षुद्र सामाजिक व सियासी समझ के लोगों की कुंठा का द्योतक है। बावजूद इसके, कुछ लोग इस सरकार, इसकी असह्य बदमाशी, अवैज्ञानिक सोच को बढ़ावा देने की घिनौनी हरकत और सामाजिक समरसता को तार-तार करने के कुटिल षडयंत्र, राम मंदिर के नाम पर धार्मिक उन्माद में देश को झुलसाने वाले एजेंडे को समय रहते समझने से लगभग इंकार कर रहे हैं। रोहित को जिस अवसाद के गर्त में साज़िशन धकेला गया, देश के अनेकों विश्वविद्यालयों में हर साल ऐसी स्थिति उत्पन्न कर दी जाती है। यदि दृढ़ इच्छाशक्ति न हो उस मकड़जाल से बाहर निकलने की, तो छटपटाहट में आदमी वही कर बैठेगा, जो रोहित ने किया; जो उस समाज व लम्बे संघर्ष के लिए अपूरणीय क्षति होगी। ज़िंदगी तो जूझने का नाम है न, इसलिए रोहित की लड़ाई बेकार नहीं जायेगी। वंचितों-शोषितों-पीड़ितों को जीवटता से लड़ने की ज़रूरत है तबतक, जबतक सामाजिक, राजनैतिक, शैक्षणिक व आर्थिक गैरबराबरी खत्म नहीं हो जाती।एक तरफ विशेष रूप से सक्षम लोग (डिफरेंटली एबल्ड) को नरेंद्र मोदी दिव्यांग कहकर भाषायी संज़ीदगी का मज़ाक उड़ाते हुए शब्द को अनर्गल ढंग से ज़ाया कर रहे हैं, तो दूसरी ओर दिल्ली विश्वविद्यालय के अंग्रेज़ी के प्राध्यापक, पक्षाघात के शिकार जी.एन.साईंबाबा की जमानत रद्द करते हुए उन्हें अंडा सेल में डाल दिया जाता है। मुझे डॉ. हादी सरमदी के कुछ अशआर याद आ रहे हैं –

जबकि तेरी चारासाज़ी से यहाँ बिस्मिल हैं लोग
फिर भी तेरी ही मसीहाई के क्यों क़ायल हैं लोग।
चारसू जो बावेला हैं सब तेरे फितने से हैं
जानते हैं तुझको लेकिन तुझसे ही गाफ़िल हैं लोग।

दिल्ली विश्वविद्यालय में रामजन्म भूमि पर जनवरी, 2016 में सेमिनार आयोजित कराया गया, जिसमें पूर्व केंद्रीय मंत्री सुब्रमण्यम स्वामी ने कहा कि जो मैं कहता हूं वो होता है मैंने कहा था कि 2 जी मामले में ए राजा जेल जायेंगे वो गये. मैंने सेतुसमुद्रम के बारे में जो कहा वो भी सही साबित हुआ. अब राम मंदिर के बारे में कह रहा हूं कि इस साल के अंत तक अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण कार्य शुरू कर दिया जाएगा और 9 जनवरी को इसके लिए एक्शन प्लान का ऐलान किया जाएगा।आम सहमति से होगा निर्माण, मंदिर का निर्माण किसी आंदोलन के जरिए नहीं किया जाएगा। इस आयोजन के विरोध में वाम संगठन, एनएसयूआइ व आप के छात्र संगठन ने जमकर प्रदर्शन किया व सवाल किया कि कुलपति ने ऐसे आयोजन की अनुमति कैसे दी. दिल्ली विश्वविद्यालय में हर समुदाय के बच्चे पढ़ाई के लिए आते हैं, ऐसे में धार्मिक विषय पर सेमिनार आयोजित करना अनुचित है. अयोध्या में बढ़ती सुनियोजित सरगर्मी के बीच सुब्रमण्यम स्वामी का सेमिनार आयोजित करना और भाजपा के प्रवक्ताओं द्वारा उसे न्यायोचित ठहराये जाने के बाद सरकार का एजेंडा साफ हो जाता है। लोगों को भड़काकर चुनाव जीतने के लिए यह सरकार किसी भी हद तक गिर सकती है, जिससे प्रधानमंत्री मोदी अछूते नहीं रहेंगे। दिल्ली व बिहार में हम जनता की परिपक्वता एवं धन के भोंडे प्रदर्शन व सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग पर उसके आक्रोश की अभिव्यक्ति भाजपा की घरवापसी के रूप में देख चुके हैं। फिर भी संघ परिवार के नीति नियंताओं को देश का मूड, जनता का मानस व मुल्क की गंगा-जमुनी तहज़ीब समझ में नहीं आ रही। हादी साहब ठीक ही कहते हैं –

क्यों ज़माने का हरेक ग़म तुझसे ही मंसूब हो
कारोबारे-ज़िंदगी में और भी शामिल हैं लोग।
एक फकत तू ही नहीं है हुस्नकारी में शरीक
अंजुमन की रौनकों में और भी शामिल हैं लोग।

राम मंदिर के साथ-साथ गाय का मुद्दा भी बीजेपी चुनाव के वक़्त उठाती रही है, दादरी में अख़लाक के साथ जो हुआ, वो किसी भी सभ्य व चिंतनशील समाज में किसी क़ीमत पर स्वीकार्य नहीं हो सकता। गोपालक हम, और गाय पर ओछी राजनीति करो तुम।द्रष्टव्य है कि क्षुद्रों की तमाम कोशिशों के बावजूद आज कृषि व पशुपालन जातिनिरपेक्ष पेशे बन चुके हैं। गोमाता व वृषभ पिता की परम्परा वाले (सरल शब्दों में, “गाय हमारी माता है, बैल हमारा बाप है” का सिंहनाद करने वाले) हुलसित लोग जब किसी की फूड हैबिट (खाद्य-आदत) को जबरन कुप्रभावित करने की ओछी हरकत करते हैं, तो मेरे तलवे की लहर मगज पर चढ़ जाती है। भारतीय संस्कृति की चिंता में दिन-रात दुबलाये जा रहे इन भागवतियों में आधे से ज़्यादा ने कभी गाय को चारा नहीं दिया होगा, उसका गोबर नहीं उठाया होगा, और चले हैं बेचारी निश्छल गाय को नाहक सियासी अखाड़े में कुदवाने। मैं दावे से कहता हूँ कि इनमें से अधिकांश अनर्गल प्रलाप करने वाले संस्कृति के बेवकूफ ठेकेदारों को को ये भी नहीं पता कि दूध दुहा कैसे जाता है। ये पूँछ पकड़ के वैतरणी पार करने वाले लोग ज़रा थन को हाथ तो लगायें, इनकी गोमाता ने इनके उदर में सींग न भोंक दिया, तो फिर कहना। ऐसी लताड़ मारेगी न कि पिछड़ के चित्त हो जायेंगे। गाय को पाले-पोसे कोई और, और उसे सामाजिक समरसता को तार-तार करने की कुत्सित मंशा से राजनीति की वस्तु बनायें ये ओछी मानसिकता के क्षुद्र लोग। आख़िर, तुम होते कौन हो ये जाँच करने वाले कि किसी की रसोई में क्या पक रहा है, क्या नहीं ? बेशर्म-बेहया-बेग़ैरत, बैठारू, निकम्मे, निठल्ले, अकर्मण्य, जाहिल खुराफाती लोग…

आज चारों ओऱ नवउदारवाद का कहर बरपा हुआ है, बाज़ारवाद का डंडा चल रहा है, डब्ल्यूटीओ के सामने घुटने टेककर शिक्षा को बाज़ार की वस्तु बना दी गयी है। लोगों को दो जून की रोटी नहीं नसीब हो रही है, बुंदेलखंड मे सूखे की मार है, लोग त्रस्त हैं, और हमारे देश की ढीठ सरकार को राम मंदिर की पड़ी है। ऊपर से स्वामी की नेशनल चैनल पर एख तरह से ये धमकी कि हम फिर से नहीं चाहते कि ख़ून-ख़राबा है, 2000 लोग फिर से मारे जायें, इसलिए आपसी सहमति से, प्यार से मंदिर के निर्माण पर मुसलमान लोग मान जायें। एक ओर सेल्फी विद डॉटर का तामझाम प्रधानमंत्री करते हैं, तो दूसरी ओर नॉन-नेट फेलोशिप को बंद किये जाने के ख़िलाफ आवाज़ उठाने वाली बेटियों के ऊपर डंडे बरसाये जाते हैं। और, आप भलीभाँति जानते होंगे कि जिस दिन मातृशक्ति, माँ की सत्ता अपना आपा खोती है, बड़ी-बड़ी शक्तियाँ उखड़ जाती हैं।यह ऑकुपाय यूजीसी मूवमंट इस अकर्मण्य सरकार की शिक्षा-विरोधी, छात्र-विरोधी छवि को हमारे सामने रखता है। एक तो ऐसे ही हमारे देश में गुणवत्तापूर्ण शोध को लेकर उदासीनता का माहौल है, ऊपर से सरकार इस कदर कहर ढा रही है कि लगता है जैसे इसके पास अपना कोई मस्तिष्क है ही नहीं। पूरी बेशर्मी के साथ उच्च शैक्षणिक संस्थानों का बेड़ा गर्क़ करके, आख़िर में उनकी गुणवत्ता का बहाना बनाकर उन्हें निजी हाथों को बेचने पर ये बेग़ैरत सरकार तुली हुई है। एटेंशन सीकिंग सिंड्रोम से पीड़ित मुखिया की अगुवाई वाली ऑस्ट्रिच सिंड्रोम की शिकार सरकार न तो शालीन प्रतिरोध का असर समझती है और न ही मर्यादित संवाद का मतलब जानती है। बिढ़नी के खोते में इसने हाथ डाल दिया है, बहुत महँगा पड़ेगा।ये लड़ाई किसी ख़ास वर्ग की नहीं है, ये दलितों की लड़ाई नहीं है, ये पिछड़ों की लड़ाई नहीं है, ये आदिवासियों की लड़ाई नहीं है, ये अगड़ों की लड़ाई नहीं है, बल्कि ये विशुद्ध छात्र-समुदाय के हितों व उसके संबल से जुड़ी लड़ाई है। ये बेहद लंबा, समग्र औऱ समावेशी संघर्ष है। इसलिए, देश भर का सजग छात्र तबके ने अपने बहुमूल्य समय में से थोड़ा-सा हिस्सा इस मुहिम को दिया है। हादी सरमदी फरमाते हैं –

वो जो फिरता है मसीहा बने गलियों-गलियों
शहर का शहर ही बीमार किया है उसने।
अब हो युसूफ कि ज़ुलेख़ा सभी बिकते हैं यहाँ
जाबजा मिस्र का बाज़ार किया है उसने।
बस यही जुर्म दीवाने से हुआ है सरज़द
तख़्त से ताज से इंकार किया है उसने।

आज राममंदिर के तराने छेड़ने के साथ देश की शिक्षा प्रणाली को चौपट किया जा रहा है, शिक्षा का संप्रदायीकरण हो रहा है, ऐतिहासिक तथ्यों को तोड़ा-मरोड़ा जा रहा है। यह भी कचोटने वाला पक्ष है कि जब एक खास दल की सरकार आती है, तो इतिहास की पाठ्यपुस्तक में दो पृष्ठ जोड़ दिये जाते हैं, और दूसरी विचारधारा की सरकार आती है, तो उन दो पन्नों को पुनः फाड़कर हटा दिया जाता है। यह हमारे ऐतिहासिक तथ्यों के प्रस्तुतीकरण का घोर दुर्भाग्यपूर्ण मौजूदा सच है।यूपी में राम को भाजपा अपना प्राथमिक सदस्य बना लेती है, तो बिहार में कृष्ण को। और, प्रधानमंत्री चुनावी भाषण में मंच से गला फाड़कर कहते हैं कि हे यदुवंशियों, मैं उसी द्वारिका से आया हूँ, जहाँ कृष्ण का जन्म हुआ था। नर्सिंग होम के उद्घाटन के वक़्त भारत को शल्य विज्ञान (सर्जरी) के विकास की भूमि बताते हुए वे भगवान गणेश के इलाज की मिसाल दे डालते हैं।ऐसी पाखंडी, पोंगापंथी व दकियानूसी विचारधारा की अंतर्विरोधों वाली, दोहरी राजनीति व दोगली नीति की सरकार पहले कभी नहीं आयी। यह जायेगी भी उद्योगपतियों के हाथ में खेलने, उन्मादी मजहबी सियासत को बढ़ावा देने व देश को पीछे धकेलने के अपने तंग नज़रिये के चलते। भारतीय संस्कृति पर अपना कॉपीराइट जताने वाले व हिंदू धर्म व देवी-देवताओं की रक्षा करने वाले इन प्रकांड पंडितों व पहुँचे हुए फकीरों को देखकर भागलपुर वि.वि. के अंग्रेज़ी विभाग के रिटायर्ड प्रफेसर डॉ. धीरज तपन कुमार दत्ता की याद आती है, जो एक किताब लिख रहे हैं – “फॉर गॉडस सेक लेट गॉड लीव अलोन” (“भगवान के लिए भगवान को उनके हाल पर तन्हा छोड़ दो”)।1989 के सांप्रदायिक दंगे में झुलसे शहर भागलपुर में अंग्रेज़ी के सेवानिवृत्त प्राध्यापक व मशहूर शायर डॉ. मसऊद अहमद ने अमन-चैन की अपील की है –

क्यों बाँटते हो अनासिर के हसीं संगम को
आग, पानी, हवा, मिट्टी की कोई जात नहीं।

(जयन्त जिज्ञासु, लेखक जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली में सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज़ में शोधार्थी हैं)

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