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यूरोपियन यूनियन ने लताड़ा उबेर को: अपनी सरकार पत्थर की तरह बेहिस-ओ-बेजान सी क्यों है ?

यूरोपियन यूनियन ने लताड़ा उबेर को
फोटो : गमन फिल्म से फारूक शेख, टैक्सी ड्राईवर के रोल में.  सीने में जलन और हर शख्स परेशान है, इस शहर में ? काली पीली तो पहले ही अपने यूनियनों पर भरोसा छोड़ दिए हैं. ओला और उबेर से कम से कम ये हुआ है कि जो यूनियन को गाली देते थे, वही यूनियन बना के प्रदर्शन कर रहे हैं, अलग-अलग शहरों में. महाराज! दिल्ली, उदैपुर, बैंगलोर, चेन्नई, भुबनेश्वर छोड़िये पूरे विश्व में उबेर के खिलाफ प्रदर्शन चले. अंतर यह है कि अमेरिका, यूरोप और ऑस्ट्रेलिया में सरकार ने उनपर जुर्माना लगाया और यहाँ की सरकार उन्हें ठीक से हूल भी नहीं दे पा रही. माजरा क्या है ?

उबेर एक परिवाहन सेवा कंपनी है, यूरोपीय न्यायालय (ईसीजे) ने एक टैक्सी ऑपरेटर के रूप में ईयू के भीतर कड़े विनियमन और लाइसेंसिंग को स्वीकार करने की आवश्यकता की है.

यह फैसला उबेर के तर्क पर जोरदार तमाचा है कि यह केवल चालकों की ओर से कार्य करने वाला एजेंट है, और इसलिए उन्हें न्यूनतम मजदूरी और छुट्टियों का भुगतान करने के लिए उत्तरदायी नहीं है.

उबेर के हिसाब से वो एक ड्राइवर प्लेटफॉर्म है जो बस चालकों और सवारों को जोड़ता है. इस झूठे वर्गीकरण ने उबेर को अपने मजदूरों को कम मजदूरी पर लंबे समय तक काम करने के लिए बाध्य करने की अनुमति दी है, जो खतरे में यात्री और सार्वजनिक सुरक्षा रखता है.

उबेर ड्राइवरों को बहुत अधिक घंटे काम करने के लिए प्रोत्साहित करता है और इसका व्यवसाय मॉडल सार्वजनिक सुरक्षा को गंभीर जोखिम में डालता है.

पता नहीं उच्च वर्ग के राष्ट्रवादी लोग भी अपनी सहूलियत के कारण एक विदेशी कंपनी पर क्यूँ पैसा देते हैं. टेक्नोलॉजी किसके हाथ में है और मालिक कौन गुलाम कौन है ? आईना देख के थोडा परेशान होने की जरूरत है. काली पीली में क्या है जो ओला उबेर में नहीं है ? कुछ अंतर लगता है आपको ?

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