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देश vs भक्त

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विशाल भरद्वाज 

आज कल टी.वी पे आप लोग काफी सारे डिबेट देख रहे होंगे, काफी सारे डिबेट्स में स्टूडेंट से संबंधित विषयों पे चर्चा किया जा रहा है. इन में से अधिकतर न्यूज़ चैनल के एंकरों ने स्टूडेंट मूवमेंट को देश हित में न होने का दावा करते हुए उन्हें राष्ट्र विरोधी घोषित कर दिया है. इन डिबेट्स में आपने ये भी देखा होगा के कैसे दो पक्षों को अपनी बात रखने के लिए बुलाकर सिर्फ एक पक्ष को बोलने का मौका दिया जाता है, कैसे न्यूज़ एंकर्स चिल्ला-चिल्ला कर स्टूडेंट्स को देश-द्रोही करार देते हैं. उन्हें अपनी बात रखने का मौका ना के बराबर दिया जाता है.

इस समस्या पे चर्चा करने की बजाए, दोनों पक्षों की बात सुनने की बजाए वहां स्टूडेंट पक्ष को बुला के अपमानित किया जाता है. उन्हें माओवादी से भी खतरनाक कहा जाता है. चैनलस पे ऐसे वीडियोस दिखाए जाते हैं जो के सही है या गलत किसी को पुख्ता तौर पे मालूम नहीं होता है, पुलिस को नसीहत भी दे डालते हैं की इसे सबूत के तौर पे पेश किया जाए. देश-प्रेम की  भावना में अंधे इन एंकरों ने बात की गहराई तक पहुँचने की कोशिश नहीं की.

किसी की चिता पे गोल रोटी कैसे सेकना चाहिए ये राजनेताओं ने बड़े खुबसूरती से हमें दिखाया. हमारे देश में किसकी रक्षा को ज्यादा महत्त्व दिया जाता है ये तो आपने देख ही लिया होगा. बिना जांच के, बिना किसी पुख्ता सबूत के एक स्टूडेंट को देश-द्रोह के मामले में जेल की हवा खानी पड़ती है, वहीँ पे सही और गलत की दलील देने वाले वकील जो खुले सांड की तरह किसी को भी मरने पे अमादा हो जाते हैं उन्हें हीरो बनाकर पेश किया जाता है, उनका सत्कार किया जाता है, मालाएं पहनाई जाती हैं. ये वकील खुद को देश-भक्त समझते हैं तो ये कहाँ थे जब गुजरात में दंगे हुए थे, जब मुज्ज़फर नगर में मासूम लोगों को क़त्ल किया गया था, जब किसी गरीब या पिछड़े वर्ग के लोगों को सताया जाता है? देश-भक्ति वन्दे मातरम बोलने से आती है, वन्दे मातरम बोलो और बाकियों के सर फोड़ो. इस मसले में वकीलों को सही और गलत को सामने लाना चाहिए और अनजाने में ही सही वो काफी हद तक सफल भी रहे. लोग कहते हैं की इस देश में पुलिस केवल दर्शक बने रहती है, लेकिन पुलिस करती भी तो क्या एक तरफ मीडिया का डंडा, दूसरी तरफ वकीलों का डंडा, तीसरी तरफ सरकार का हथोडा, हाँ एक तरफ बच जाता है जहाँ से वो भागने में ही अपनी भलाई समझते हैं.

तो सवाल ये खड़ा हो जाता है के क्या स्टूडेंट्स, जो की पढने जाते हैं, देश के लोगों के खून-पसीने में मिला हुए टैक्स का गलत इस्तेमाल करते हैं? उन्हें वहां से अच्छे “भक्त” निकल के आना चाहिए, लेकिन वहां स्टूडेंट्स अच्छे “नागरिक” बनना पसंद करते हैं. और अच्छा नागरिक वो है जो सवाल पूछे, जो सरकार की नीतियों पे चर्चा करे, जो सरकार के गलत रव्वैये पे बोलने से हिचके नहीं. तब जा कर हमारा सिस्टम थोडा-बोहोत साफ़ होगा सरकार को उनकी गलतियों पे घेरना चाहिए ताकि वो अच्छा काम करने पे मजबूर हो जाए या अपनी कुरसी को अलविदा कह दे, अलविदा तो वो कहेंगे नहीं. जब स्टूडेंट्स को वोट करने का अधिकार है सरकार चुनने का अधिकार है तो उन्हें सरकार के विरुद्ध बोलने का या आलोचना करने का अधिकार भी होना चाहिए.

स्टूडेंट्स को आड़े हाथ लेने के बजाए सरकार को अपने बड-बोले नेताओं को शिक्षित होने के लिए जे.एन.यू भेजना चाहिए, यकीन मानिये देश के टैक्स पयेर्स काफी खुश होंगे ये जान कर के उनका खून-पसीने से सना हुआ पैसा किसी “भक्त” को अच्छा नागरिक बनाने में लगाया जा रहा है. सरकार मुज्ज़फर नगर रोके, गुजरात रोके, ग़रीबी रोके, जातीवाद रोके, विदेश यात्रा भी थोडा बोहोत रोके, स्टूडेंट्स के बढ़ते कदम को नहीं.

(विशाल भरद्वाज द सभा में इंटर्नशिप कर रहे हैं. इससे पहले इन्होने फिल्म बनाने पर पढाई की है )

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