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कोरेगांव हिंसा के मुख्य आरोपी ‘संभाजी’ मनोहर भिडे और मिलिंद एकबोटे. फिर पुलिस किसे पकड़ रही ?

फ़रवरी प्रिंट अंक कोरेगांव   हिंसा के मुख्य आरोपी

मंडल कमीशन द्वारा आरक्षण विश्वविध्यालयों में जारी करने के आज करीब १७ साल बाद वो समाज जिस पर दुसरे का लिखा हुआ इतिहास थोपा गया था, आज अपनी भाषा, लहजा में अपनी बात कह रहा है. अब लिखेंगे नहीं तो नहीं न होगा. और जब लिखेंगे और बोलेंगे तो तकलीफ तो होगी. उन्हें जो कि अपने आपको सर्वोच महान संस्कारी समझते हैं. समानता और मेरिट की बातें करते हैं, और थेतरई में पीएचडी. काल्पनिक कहानियों पर हर साल अनेक धर्म का पर्व मनता है, पर इस ‘कलयुग’ में ही २०० साल से जो आँखों देखीं शौर्य का उदहारण है, वो नहीं पच रहा. कहते हैं साइंस को टाइम लगेगा पकड़ने में इनकी काल्पनिक इतिहास को. साइंस को काफी बिजी कर रखा है. मतलब गौ मूत्र अच्छा होगा, पर कितना और अच्छाई निकालेंगे ?
थोडा जातिवादी मीडिया और ये लोकतंत्र को साइंस से पता करना चाहिए कि हिंसा 2 जनवरी को शुरू नहीं हुई थी. 1 जनवरी को भीम कोरेगांव के आसपास शुरुआती हिंसा ‘संभाजी’ मनोहर भिडे और मिलिंद एकबोटे के संगठन द्वारा किये जाने का आरोप है.

अक्टूबर 2014 में सांगली जिले में एक चुनाव रैली के दौरान प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने संभाजी से कहा था: “भिडे गुरुजी ने मुझे यहां आमंत्रित नहीं किया. मैं उनके आदेश पर आया था. “ अब यह हिंसा किसके आदेश पर हुई? पर जेटली जी कह चूके हैं, कि सब कुछ सीरियसली मत लिया करो. हो जाता है इलेक्शन में.

क्या जुडिशल इन्क्वायरी ठीक से हो पायेगी, जिसके आरोपी का आदेश प्रधानमंत्री तक मानते हैं ? अब ये तो व्यापम घोटालों के गवाहों की आत्मा जाने, जस्टिस लोया की आत्मा जाने. नहीं तो जस्टिस करणन से ही पता करना
पड़ेगा.

फिलहाल पुलिस ने पूरे महाराष्ट्र में जगह जगह दलित नवयुवकों को उठाया है.

कुछ सवाल:

– क्या ये जातिवादी मीडिया और तंत्र के खिलाफ
मराठा और दलित समुदाय के एकता की
शुरुवात है ?
– महाराष्ट्र पुलिस में ज्यादा कौन से जाति के
अफसर हैं ? क्या पुलिस का धर्म संविधान से
जुड़ा है या उनके अफसर के समाज से ?
– क्या हिन्दुओं का ठेका संघ ने लिया है ? या
जो हिन्दू चुप हैं वो अपने नाम पर हिंसा होना
जानबूझ कर नजरंदाज़ कर रहे ? कौन हवन
में घी डाल रहा और दिमाग में हिंग ?
– जितनी जाति और धर्म सम्बंधित हिंसा हुई हैं,
उसमें पास्मन्दा मरते हैं या स्येद मरता है, दलित
मरते हैं या ब्राह्मण मरा है ?
– जब सारे लोग समानता की बात कर रहे हैं,
तो दिक्कत किधर है ? कभी जेनेटिक्स की बात,
कभी कर्म की बात. बहस कैसे करें !

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